रायपुर। नक्सलियों ने शांति वार्ता का प्रेस नोट जारी किया है। इस मामले में कांग्रेस ने कहा कि, बस्तर में शांति की पहल पर सरकार को गंभीर होना चाहिए। आदिवासियों के हित को देखकर सरकार को फैसला लेना चाहिए। अगर प्रस्ताव ऑथेंटिक है तो कांग्रेस इसका स्वागत करती है। बस्तर में शांति के लिए दोनों पक्षों को सामने आना होगा। अब फैसला सरकार को लेना है।
बस्तर के हित में फैसला ले सरकार
नक्सलियों के शांति वार्ता प्रस्ताव मामले में कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि, नक्सलियों ने ठोस प्रस्ताव दिया है तो सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। नक्सली किस स्थिति में शांति वार्ता चाहते हैं उनका क्या मकसद है, सरकार क्या सोचती है, यह फैसला सरकार को लेना होगा। सरकार सोचे बस्तर की शांति के लिए क्या बेहतर है। जो बेहतर है सरकार को वही फैसला लेना चाहिए।
शांति प्रस्ताव के लिए नक्सलियों ने रखी शर्तें
उल्लेखनीय है कि, सुरक्षाबलों की आक्रामकता को देखते हुए नक्सलियों ने प्रेस नोट जारी कर सरकार से ऑपरेशन रोकने का आग्रह किया है। शांति प्रस्ताव के लिए उन्होंने कुछ शर्तें भी रखी हैं। यह प्रेस नोट सीपीआई (माओवादी) केंद्रीय समिति के प्रवक्ता अभय ने जारी किया है। इसके जरिए नक्सलियों ने शांति वार्ता की मांग की है। उन्होंने भारत सरकार से ‘ऑपरेशन कगार’ को रोकने का आग्रह किया गया है। उनका दावा है कि, इस ऑपरेशन के नाम पर आदिवासी समुदायों के खिलाफ काफी हिंसा हुई है। वे सुरक्षा बलों की वापसी और आतंकवाद विरोधी अभियानों को रोकने की मांग करते हैं।
नक्सलियों ने शांति वार्ता के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं-
1. युद्ध विराम और शांति वार्ता की अपील
- सीपीआई (माओवादी) केंद्रीय समिति ने मध्य भारत में युद्ध को तत्काल रोकने का आह्वान किया है।
- वे शांति वार्ता को सुगम बनाने के लिए भारत सरकार और सीपीआई (माओवादी) दोनों से बिना शर्त युद्ध विराम की मांग करते हैं।
2. सरकार का माओवादी विरोधी अभियान ('कागर' ऑपरेशन)
- भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ मिलकर माओवादी-प्रभावित क्षेत्रों को लक्षित करते हुए 'कागर' नामक एक गहन आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया।
- इस अभियान के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर हिंसा, हत्याएं और सामूहिक गिरफ्तारियां हुई हैं।
3. हताहतों की संख्या और मानवाधिकार उल्लंघन
- 400 से अधिक माओवादी नेता, कार्यकर्ता और आदिवासी नागरिक कथित तौर पर मारे गए हैं।
- महिला माओवादियों को कथित तौर पर सामूहिक यौन हिंसा और फांसी का सामना करना पड़ा है।
- कई नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है और उन्हें अवैध हिरासत और यातना दी गई है।
4. शांति वार्ता के लिए माओवादियों की शर्तें
- प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों से सुरक्षा बलों की तत्काल वापसी।
- नई सैन्य तैनाती का अंत।
- आतंकवाद विरोधी अभियानों का निलंबन।
5. सरकार के खिलाफ आरोप
- सरकार पर क्रांतिकारी आंदोलनों को दबाने के लिए आदिवासी समुदायों के खिलाफ "नरसंहार युद्ध" छेड़ने का आरोप है।
- नागरिक क्षेत्रों में सैन्य बलों के उपयोग को असंवैधानिक बताया जाता है।
6. सीपीआई (माओवादी) ने जनता से समर्थन मांगा
- माओवादियों ने बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों, छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से शांति वार्ता के लिए सरकार पर दबाव बनाने का आग्रह किया।
- वार्ता के लिए गति बनाने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का अनुरोध किया गया।
7. शांति वार्ता के लिए माओवादियों की तत्परता
- अगर सरकार उनकी पूर्व शर्तों पर सहमत होती है तो वे बातचीत में शामिल होने की इच्छा व्यक्त करते हैं।
- सीपीआई (माओवादी) ने कहा कि जैसे ही सरकार सैन्य अभियान बंद करेगी, वे युद्ध विराम की घोषणा करेंगे।